| आत्म-परिचय |

मैं अपना परिचय क्या दूँ, कुछ अपना हो तो दूँ। सिवाय अवगुणों के कोई गुण खोजने पर भी नहीं मिलता मुझे खुद में। हाँ,जब से होश संभाला, खुद को संघर्ष करते पाया और उसके बाद संघर्ष ही मेरा जीवन बन गया। ये संघर्ष ही मुझे प्रेरणा देता है,ऊर्जा देता है,और जीतने का जुनून भी।

28 जनवरी,78 की हाड़ कंपा देने वाली सर्द रात को गोवर्धन (मथुरा) में मेरा जन्म हुआ। नाम रखा गया- श्याम सुन्दर। गोवर्धन (बृजभूमि) की परम्परा है- भगवान श्रीकृष्ण के नाम पर नामकरण की।

मेरी माँ स्व. श्रीमती तुरसो देवी, जो मेरे जीवन के सबसे संघर्ष के क्षणों तक मेरे साथ रहीं, और जब मैं उनकी सेवा कर सकने की स्थिति में आया,उन्हें कुछ खुशियाँ दे पाता, वो इस धरा धाम को छोड़कर श्रीहरि में विलीन हो गईं। उनका संम्पूर्ण जीवन स्त्री के संघर्ष कर सकने की अनन्त क्षमता, धैर्य, क्षमा, समर्पण, और दूरदर्शिता का नायाब उदाहरण है। मैं उनके शतांश के भी बराबर नहीं । ये उनकी दूरदर्शिता ही थी, कि मेरे पैदा होते ही, बच्चों के उज्जवल भविष्य की चिंता करते हुये वे मुझे और मेरे बड़े भाई ( श्री मदन मोहन पाठक ) को लेकर नैनीताल चली आईं, जो पूर्णतः उन्हीं का दूरदर्शितापूर्ण निर्णय था,जिसका परिणाम आज समस्त परिवार की प्रगति है।

चूँकि पिता जी ए.डी.ओ. (कृषि) के पद पर थे, इसलिये उनका स्थानान्तरण होता रहता था, इस कारण हमारी शिक्षा भी यायावरों की भाँति हुई। नैनीताल के बाद अगला स्थानान्तरण गाज़ियाबाद हुआ, इसलिये प्रारम्भिक शिक्षा गाज़ियाबाद के लाल बहादुर सैनिक स्कूल से हुई। उसके बाद कक्षा 6 से 8 तक की शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर, अवागढ़ से हुई। वहीं से भारत की महान संस्कृति को ठीक से समझने और संस्कारों के बीज पड़े । कक्षा 9 से 12 तक की शिक्षा कासगंज के प्रतिष्ठित कॉलिज श्री गणेश इंटर कॉलिज से हुई। वे मेरे जीवन के सबसे अच्छे दिन थे । कासगंज में बीते वे दिन मेरी जिंदगी बदल देने वाले क्षण थे।

इंटरमीडिएट में जिले में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। वहाँ मुझे श्रीमती शारदा जौहरी के रूप में साक्षात माँ शारदा ही मिल गईं। उन्होंने स्पर्श क्या किया, जैसे गूँगे को स्वर मिल गये हों । ये जो भी साहित्यिक कर्म मैंने किया है, हिंदी में जो कुछ भी जाना,सीखा,और सृजन किया है,सब उन्हीं के आशीर्वाद से है। उन्हीं के कारण विज्ञान जैसे हृदयहीन विषय का अध्ययनकर्ता हिंदी साहित्य का रसिक और लेखक बन सका । स्नातक (बी.एस.सी) की शिक्षा आगरा कॉलिज, आगरा से प्राप्त हुई। रसायन विज्ञान से स्नातकोत्तर करने हेतु सरस्वती डिग्री कॉलिज पहुँचा, लेकिन अंतिम वर्ष की शिक्षा किशोरी रमण कॉलिज, मथुरा से पूरी की।

शिक्षक बनने का सपना था तो बी.एड. करने दयालबाग एजूकेशनल इंस्टीट्यूट, आगरा पहुँच गया। शीघ्र ही शिक्षक बनने का सपना पूरा हुआ और लगातार कई सफलतायें पाईं। अंतिम रूप से अमर सिंह इंटर कॉलिज, लखावटी,बुलन्दरशहर में रसायन प्रवक्ता के पद पर शिक्षण कार्य शुरू किया जो 11 वर्ष चला । चूँकि शिक्षक बनने का सपना था, अतः शिक्षक बन कर संतुष्ट था। विद्यार्थियों का प्यार और सम्मान खूब मिला।

लेकिन नियति को कहीं और जगह ले जाना था । परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनीं कि सिविल सेवा को विकल्प के रूप में चुना।

30 वर्ष की उम्र, और दोनों बच्चों ( ओम और शिवप्रिया ) के होने के बाद तैयारी शुरू करना जितना दुष्कर कार्य था , उसे मैं शब्दों में व्यक्त करना नामुमकिन है । कभी लिख सका तो शायद महाग्रंथ बन जाये ।

शुरूआती वर्षों में असफलता ही हाथ लगी, लेकिन 3.5 वर्ष बाद जब सफलता मिलनी शुरू हुई तो फिर कई मिली । उत्तराखण्ड़, राजस्थान और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में कई सफलतायें मिली।

ये सारी सफलतायें मेरी माँ,जो हर समय मेरे ऊपर अपनी कृपा का वरदहस्त फैलाये रखती हैं, के आशीर्वाद से संभव हुई। पिता से सीखा कठोर अनुशासन और दृढ़ इच्छाशक्ति मेरे काम आई। मेरी धर्मपत्नी निधी पाठक – जो बहुत ही धर्मपरायण और कर्त्तव्यनिष्ठ हैं- मेरी शक्ति,सामर्थ्य,परिश्रम और प्रगति का सबसे बड़ा आधार हैं।

आध्यात्मिक गुरू के रूप में मुझे साक्षात आशुतोष ही मिल गये। सर्व श्री आशुतोष जी महाराज जी से ब्रह्मज्ञान की दीक्षा पाई और जैसे सब कुछ बदल गया। एक पूर्ण गुरू सर्वसमर्थ होता है, ये उनसे जाना। उन्होनें ही हर पल मुझे पिता की तरह मार्ग दिखाया और माँ की तरह संभाला। मैं आज जो कुछ भी हूँ, उन्हीं की कृपा से हूँ।

प्रांतीय शिक्षा सेवा (पी.ई.एस.) के अन्तर्गत सर्वप्रथम प्रधानाचार्य के रूप में लगभग एक वर्ष कार्य किया, जिसमें किये गये कार्य मुझे आज भी सुकून और आत्म-संतुष्टि प्रदान करते हैं। उसके बाद पद-त्याग करके वाणिज्य कर विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर के रूप में सेवा देना शुरू किया और प्रथम नियुक्ति मेरी कर्मभूमि आगरा हुई। आगरा हमेशा मेरी स्मृतियों में रहता है, जहाँ मैंने बहुत कुछ सीखा,जाना,पहली बार प्रेम को समझा,महसूस किया ।

यूँ तो गीत-संगीत, चित्रकारी, ज्योतिष, वास्तुकला, प्रेरण-व्याख्यान, लेखन लगभग हर क्षेत्र में मेरी रूचि है, लेकिन मूलतः मैं एक कवि हृदय हूँ,जो हर छोटी-बड़ी चीज़ में भाव और सौन्दर्य ढ़ूँढ़ लेता है।

ये तो नहीं पता कि इतिहास मुझे किस रूप में याद रखेगा, लेकिन इतना अवश्य चाहता हूँ कि मैं अपने मन,वचन और कर्म से देश के, समाज के काम आ पाऊँ।

यदि मैं इस दुनिया को थोड़ा भी सुंदर बना पाया तो मेरी दादी का रखा ये नाम शायद सार्थक हो जाये।

हृदय की अनन्त गहराईयों से धन्यवाद।

– श्याम सुंदर पाठक। 'अनंत'